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जून,2026
जब इलाहाबाद के कोर्ट रूम में सन्नाटा छाया हुआ था, तो न्यायाधीश की आवाज़ गूंजी—"जब सरकार को पता था कि 26 मई को पंचायतों का कार्यकाल खत्म हो रहा है, तो फिर इतनी देरी क्यों की गई?" यह सवाल सिर्फ एक प्रश्न नहीं, बल्कि उत्तर प्रदेश सरकार के लिए एक कड़ी चेतावनी थी। त्रिस्तरीय पंचायत चुनावों में हुई अनपेक्षित देरी पर इलाहाबाद हाईकोर्ट ने अमर्यादित लंबित मामले को लेकर राज्य सरकार और राज्य निर्वाचन आयोग (UP) से स्पष्टीकरण मांगा है। इस मामले की सुनवाई अब तक कम से कम छह बार स्थगित हो चुकी है, जिससे जनता में असंतोष बढ़ा है।
यहाँ बात सिर्फ तारीखों की नहीं है, बल्कि लोकतंत्र की नींव को हिला देने वाले प्रक्रियागत ढील-डाल की है। जब ग्राम पंचायत, क्षेत्र पंचायत और जिला पंचायत के चुनाव समय पर नहीं होते, तो गांवों में विकास कार्यों की गति रुक जाती है। मामला यह है कि योगी आदित्यनाथ, मुख्यमंत्री की अध्यक्षता वाली सरकार ने अदालत को बताया कि उसने पिछड़ा वर्ग आयोग (ओबीसी कमिशन) का गठन कर दिया है। लेकिन अदालत ने तुरंत ही पूछताछ शुरू कर दी कि यह प्रक्रिया पहले क्यों नहीं शुरू की गई।
सुनवाई के दौरान न्यायालय ने सरकार के जवाब पर संदेह जताया। सरकारी पक्ष ने दावा किया कि ओबीसी आयोग का गठन हो चुका है, लेकिन अदालत ने तर्क दिया कि यदि पंचायतों के कार्यकाल समाप्त होने की तारीख (26 मई) पहले से ज्ञात थी, तो आयोग के गठन और अन्य आवश्यक प्रक्रियाओं में इतनी देरी क्यों हुई? यह सवाल सरकार की तैयारियों पर प्रश्न चिन्ह खड़ा करता है।
एक दिलचस्प मोड़ यह सामने आया है कि सरकार ने ओबीसी आयोग को अपनी रिपोर्ट तैयार करने के लिए कुल "छह महीने" का समय दिया था। वहीं, अदालत ने आयोग को रिपोर्ट "10 जुलाई" तक पेश करने का निर्देश दिया है। यह विसंगति दिखाती है कि न्यायिक दृष्टिकोण और प्रशासनिक योजना के बीच खाई है। अदालत चाहती है कि प्रक्रिया तेज हो, जबकि सरकार की ओर से दी गई समय सीमा काफी लंबी लग रही है।
मामले की सबसे बड़ी پیچیدگی (complication) ओबीसी आयोग की रिपोर्ट से जुड़ी है। सूत्रों के अनुसार, इस रिपोर्ट के बिना पंचायत चुनाव की तिथियों की घोषणा करना संभव नहीं माना जा रहा है। रिपोर्ट में अन्य पिछड़े वर्गों के लिए आरक्षण और नामांकन संबंधी विवरण शामिल होंगे, जो चुनावी प्रक्रिया का आधार हैं।
हालांकि, भविष्यवाणियां उम्मीदवारों और राजनीतिक दलों के लिए निराशाजनक हैं। खबरों के मुताबिक, ओबीसी आयोग अपनी रिपोर्ट "नवंबर" तक दे सकता है। यदि यह अनुमान सही साबित होता है, तो "दिसंबर-जनवरी" से पहले पंचायत चुनाव कराना बेहद मुश्किल होगा। इसका मतलब है कि करोड़ों वोटर्स को अपने प्रतिनिधियों को चुनने में कई महीनों की प्रतीक्षा करनी पड़ सकती है।
तुलनात्मक दृष्टिकोण से देखें तो राजस्थान का उदाहरण प्रासंगिक है। वहां राजस्थान हाईकोर्ट ने हाल ही में एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाया था। एस. पी. शर्मा, कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश की अध्यक्षता वाली खंडपीठ ने पंचायत और निकाय चुनावों को "31 जुलाई" तक कराने का निर्देश दिया था। साथ ही, वहां के ओबीसी आयोग को "20 जून" तक रिपोर्ट देने का आदेश दिया गया था।
राजस्थान में अदालत ने न केवल समय सीमा तय की, बल्कि उसे लागू करने पर भी नजर रखी। इसके विपरीत, उत्तर प्रदेश में प्रक्रिया अभी भी धीमी गति से चल रही है। यह तुलना यूपी सरकार के लिए एक चेतावनी के रूप में काम कर सकती है कि यदि वे तेजी से नहीं आएंगे, तो अदालत कड़े कदम उठा सकती है।
अब सभी की नजरें दो दिशाओं में हैं: एक ओर ओबीसी आयोग की रिपोर्ट और दूसरी ओर हाईकोर्ट के अगले आदेश। राज्य निर्वाचन आयोग (UP) से अदालत ने विस्तृत शेड्यूल मांगा है ताकि यह देखा जा सके कि देरी को कैसे दूर किया जा सकता है। यदि आयोग अपनी तरफ से कोई ठोस योजना नहीं पेश करता, तो अदालत स्वयं प्रक्रिया में हस्तक्षेप कर सकती है।
यह मामला सिर्फ चुनावों तक सीमित नहीं है; यह शासन प्रणाली की दक्षता पर भी प्रकाश डालता है। जब स्थानीय स्तर पर निर्णय लेने वाले संस्थाएं (पंचायतें) लंबे समय तक निर्वाचित सदस्यों के बिना चलती हैं, तो जनता को नुकसान उठाना पड़ता है। आने वाले दिनों में अदालत की इस मामले पर निगरानी और भी तीव्र हो सकती है।
मुख्य कारण ओबीसी आयोग (पिछड़ा वर्ग आयोग) की रिपोर्ट का न बनना है। अदालत और सरकार के बीच इस रिपोर्ट की समय सीमा पर मतभेद हैं। सरकार ने छह महीने का समय दिया है, जबकि अदालत ने 10 जुलाई तक रिपोर्ट मांगी है। रिपोर्ट के बिना आरक्षण और नामांकन प्रक्रिया पूरी नहीं हो पाती, जिससे चुनाव की तिथियां तय नहीं हो पा रही हैं।
हाईकोर्ट ने सरकार से पूछा कि जब उन्हें पहले से पता था कि पंचायतों का कार्यकाल 26 मई को समाप्त हो रहा है, तो ओबीसी आयोग के गठन और अन्य प्रक्रियाओं में इतनी देरी क्यों की गई? अदालत का मानना है कि तैयारी पहले से शुरू की जानी चाहिए थी ताकि चुनाव समय पर हो सकें।
हाँ, राजस्थान में भी पंचायत और निकाय चुनावों में ओबीसी रिपोर्ट से जुड़े मुद्दे थे। हालांकि, राजस्थान हाईकोर्ट ने 31 जुलाई तक चुनाव कराने और 20 जून तक रिपोर्ट देने का कड़ा निर्देश दिया था। यूपी की स्थिति में अभी भी अनिश्चितता है और सुनवाई कई बार टल चुकी है।
वर्तमान अनुमानों के अनुसार, यदि ओबीसी आयोग नवंबर तक रिपोर्ट देता है, तो दिसंबर-जनवरी से पहले चुनाव कराना मुश्किल होगा। हालांकि, अदालत की कड़ी निगरानी और 10 जुलाई की समय सीमा इसे बदल सकती है, लेकिन प्रशासनिक बाधाओं के कारण देरी संभावित है।
राज्य निर्वाचन आयोग (UP) को अदालत ने विस्तृत चुनाव शेड्यूल पेश करने का निर्देश दिया है। आयोग को यह स्पष्ट करना होगा कि वे देरी को कैसे दूर करेंगे और समयबद्ध तरीके से चुनाव करवाने के लिए क्या तैयारियां की हैं। उनकी योजना अदालत की सहमति के बाद ही आगे बढ़ेगी।